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सूर्य ग्रहण शुभ या अशुभ, क्या कहते हैं हिंदू शास्त्र?

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सूर्य ग्रहण शुभ या अशुभ, क्या कहते हैं हिंदू शास्त्र?

Surya Grahan Shubh Ya Ashubh: जब दिन के उजाले में अचानक अंधेरा छा जाए और चहचहाते पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगें, तो समझ लीजिए कि ब्रह्मांड में एक अद्भुत हलचल हो रही है। सूर्य ग्रहण केवल पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य की एक सीधी लकीर में आने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह वह पल है जब समय अपनी गति थामकर हमें प्रकृति की प्रचंड शक्ति का अहसास कराता है।

सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना या नियति का संकेत?

सदियों से इंसानी सभ्यता सूर्य ग्रहण जैसे अद्भुत दृश्य को आश्चर्य और डर की मिली-जुली भावनाओं के साथ देखती आई है। हिंदू धर्म की मान्यताओं की गहराई में उतरें, तो सूर्य ग्रहण महज एक छाया का खेल नहीं, बल्कि ऊर्जा के शुद्धिकरण का एक महापर्व है।

एक तरफ जहाँ आधुनिक दुनिया इसे चश्मे लगाकर देखने का रोमांच मानती है, तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति इसे अंतर्मन में झांकने और आध्यात्मिक शक्ति को संचित करने का समय मानती है। यह वह समय है जब भौतिक जगत की रोशनी भले ही कम हो जाए, लेकिन आत्मिक ज्ञान की ज्योति को जगाने का अवसर बढ़ जाता है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार: शुभ या अशुभ?

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या सूर्य ग्रहण अशुभ होता है? हिंदू शास्त्रों, विशेषकर पुराणों और ज्योतिष ग्रंथों में ग्रहण के समय को सूतक काल के रूप में देखा जाता है।

  1. सूतक का प्रभाव: ग्रहण शुरू होने से लगभग 12 घंटे पहले सूतक लग जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दौरान प्रकृति की ऊर्जा नकारात्मक या भारी हो जाती है, जिसका सीधा असर हमारे भोजन और स्वास्थ्य पर पड़ता है।
  2. अशुभ नहीं, बल्कि सावधानी: इसे पूरी तरह अशुभ कहना गलत होगा। वास्तव में यह एक संक्रमण काल है। जैसे हम ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले सफाई का ध्यान रखते हैं, वैसे ही ग्रहण के दौरान शुद्धता के नियमों का पालन किया जाता है।
  3. पौराणिक कथा: सूर्य ग्रहण में राहु और केतु की कथा भी काफी प्रसिद्ध है। यह कथा बताती है कि जब प्रकाश (ज्ञान) पर छाया (अज्ञान) का प्रभाव पड़ता है, तो व्यक्ति को ईश्वर की शरण में जाना चाहिए।

हिंदू धर्म में सूर्य ग्रहण का स्थान और महत्त्व

हिंदू संस्कृति में सूर्य को जगत की आत्मा और प्रत्यक्ष देवता माना गया है। इसलिए जब सूर्य पर ग्रहण लगता है, तो इसे पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा का असंतुलन माना जाता है।

  • दान का महत्व: ग्रहण के बाद स्नान और दान का विशेष महत्त्व है। माना जाता है कि इस समय किया गया दान सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फलदायी होता है।
  • मंत्र सिद्धि: आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि ग्रहण के दौरान किया गया मंत्र जाप बहुत जल्दी सिद्ध होता है क्योंकि उस समय सांसारिक बाधाएं कमजोर होती हैं।
  • शुद्धिकरण: ग्रहण के बाद घरों की सफाई और गंगाजल का छिड़काव मन और वातावरण की शुद्धि का प्रतीक है।

विज्ञान बनाम धार्मिक विश्वास

आज का विज्ञान और प्राचीन धार्मिक मान्यताएं अक्सर एक-दूसरे के विपरीत खड़ी दिखती हैं, लेकिन गहराई से देखें तो दोनों के अपने तर्क हैं:

पहलूविज्ञान का नजरियाधार्मिक विश्वास
कारणचंद्रमा का सूर्य और पृथ्वी के बीच आना।राहु-केतु द्वारा सूर्य का ग्रास करना (प्रतीकात्मक)।
भोजनभोजन खराब होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।पराबैंगनी किरणों के कारण भोजन दूषित हो जाता है इसलिए भोजन में तुलसी का प्रयोग करना।
आंखेंनंगी आंखों से देखने पर रेटिना को नुकसान पहुंच सकता है।मंदिर के कपाट बंद रखना और सीधे दर्शन से बचना।
गर्भवती महिलाएंकोई वैज्ञानिक खतरा प्रमाणित नहीं है।बच्चे की सुरक्षा के लिए विशेष सावधानी बरतने की सलाह।

ऐसा माना जाता है कि ग्रहण के दौरान सूर्य की किरणें बदल जाती हैं, जो जीव-जंतुओं को प्रभावित कर सकती हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म में भोजन में तुलसी के पत्ते डालने की सलाह दी जाती है, क्योंकि तुलसी एक प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और रेडिएशन प्रोटेक्टर का काम करती है।  

सूर्य ग्रहण के दौरान क्या करें और क्या न करें?

शास्त्रों और परंपराओं के आधार पर कुछ सरल नियम यहाँ दिए गए हैं, जैसे-

क्या करें:

  • मानसिक जाप और ध्यान करें।
  • खाने-पीने की वस्तुओं में तुलसी के पत्ते डालें।
  • ग्रहण समाप्त होने पर स्नान करें और दान दें।

क्या न करें:

  • सूतक काल में भोजन पकाने और खाने से बचना चाहिए।
  • मूर्ति पूजा वर्जित होती है, इसलिए मंदिरों के पट बंद रहते हैं।
  • नुकीली वस्तुओं जैसे कैंची, सुई आदि का प्रयोग न करें।

अंत में कुछ बातें  

सूर्य ग्रहण हमें सिखाता है कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह अस्थायी है। विज्ञान हमें इसके बाहरी स्वरूप को समझने में मदद करता है, तो धर्म हमें इसके भीतर छिपे आध्यात्मिक अर्थों से जोड़ता है।

यह डरे बिना प्रकृति के नियमों का सम्मान करने का समय है। यदि हम सावधानी और श्रद्धा के साथ इस समय का सदुपयोग करें, तो यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य और आत्मिक शांति के लिए वरदान साबित हो सकता है।

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FAQs

1. सूर्य ग्रहण के दौरान भोजन में तुलसी का पत्ता क्यों डाला जाता है?

उत्तर- तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-रेडिएशन गुण होते हैं, जो ग्रहण के दौरान वातावरण में फैलने वाली अशुद्धियों से भोजन को सुरक्षित रखते हैं।

2. क्या सूर्य ग्रहण के समय सोना वर्जित है?

उत्तर- जी हाँ, हिंदू शास्त्रों के अनुसार ग्रहण काल में सोने से बचना चाहिए। इस समय को साधना का समय माना जाता है।

3. सूतक काल क्या है और यह कब शुरू होता है?

उत्तर- सूतक काल वह समय है जब ग्रहण का प्रभाव शुरू होने के कारण वातावरण को अशुद्ध माना जाता है। सूर्य ग्रहण में यह ग्रहण शुरू होने से ठीक 12 घंटे पहले शुरू हो जाता है।

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