SC की मंजूरी: हरीश राणा को मिली इच्छा मृत्यु, क्या है पूरा मामला?

Harish Rana Case Final Judgement in Hindi : हाल ही में, भारत की सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 'जीवन और मौत' की परिभाषा बदल दी है। कोर्ट ने हरीश राणा को 'पैसिव यूथेनेशिया' यानी 'निष्क्रिय इच्छा मृत्यु' की मंजूरी दे दी है, जिससे अब उन्हें गरिमा के साथ विदा होने का हक मिलेगा।
बता दें कि 'निष्क्रिय इच्छा मृत्यु' का मतलब होता है कि जब किसी ऐसे मरीज को, जिसके ठीक होने की कोई उम्मीद न बची हो, उसे जिंदा रखने के लिए दिए जा रहे बाहरी सहारे (जैसे वेंटिलेटर, ऑक्सीजन या फीडिंग ट्यूब) को हटा लिया जाता है, ताकि उसकी प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो सके।
भारतीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब अदालत ने किसी व्यक्ति को इस तरह 'राइट टू डाई विद डिग्निटी' यानी गरिमा के साथ मरने का अधिकार के तहत, जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की मंजूरी दी है।
Harish Rana Case Final Judgement in Hindi
कौन हैं हरीश राणा?
हरीश राणा की कहानी दिल को झकझोर देने वाली है। करीब 11 साल पहले एक हादसे ने उनकी दुनिया बदल दी थी। वह तब से 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में थे। इसका मतलब है कि उनका दिमाग पूरी तरह काम करना बंद कर चुका था, लेकिन उनका शरीर मशीनों और मेडिकल सपोर्ट के सहारे जीवित था।
हरीश के साथ हुए दर्दनाक हादसे के बाद, उनकी हालत ऐसी हो गई थी कि वह न बोल सकते थे, न चल सकते थे और न ही अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते थे। उनके माता-पिता ने सालों तक उनकी सेवा की, लेकिन जब उम्मीद की कोई किरण नहीं बची, तब उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटा पड़ा।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अनिश्चित काल तक दर्द और ऐसी स्थिति में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जहां गरिमा पूरी तरह खत्म हो चुकी हो। इतना ही नहीं, भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर माना कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।
अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए यह कहा है कि भारतीय कानून के 'अनुच्छेद 21' के तहत मिलने वाला 'जीवन का अधिकार' सिर्फ सांसें लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है।
क्या है 'पैसिव यूथेनेशिया'?
- एक्टिव यूथेनेशिया: इसमें इंजेक्शन या किसी दवा के जरिए सीधे तौर पर मृत्यु दी जाती है। एक्टिव यूथेनेशिया भारत में अवैध है।
- पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छा मृत्यु): इसमें मरीज को जीवित रखने के लिए जो बाहरी सहारा जैसे कि वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब को हटा लिया जाता है ताकि प्राकृतिक रूप से उस व्यक्ति की मृत्यु हो सके।
अदालत ने क्यों लिया यह फैसला?
हरीश राणा मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे तीन बड़े कारण थे, जिसे आप निम्नलिखित बातों समझ सकते हो:
- ठीक होने की शून्य उम्मीद: हरीश राणा की स्थिति इतनी नाजुक थी कि डॉक्टरों ने साफ कर दिया था कि उनके दोबारा सामान्य होने की कोई उम्मीद नहीं बची है।
- असहनीय पीड़ा: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, भले ही मरीज बोल न पाए, लेकिन लंबे समय तक मशीनों पर रहना मरीज और उसके परिवार के लिए एक मानसिक और आर्थिक बोझ बन जाता है।
- माता-पिता की गुहार: हरीश के बुजुर्ग माता-पिता अब उनकी देखरेख करने में शारीरिक और आर्थिक रूप से असमर्थ थे। वे चाहते थे कि उनका बेटा और ज्यादा कष्ट न सहे।
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इस फैसले का समाज पर प्रभाव
सच तो यह है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया गया यह फैसला सिर्फ हरीश राणा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों के लिए एक उम्मीद की तरह है जिनके अपने 'वेजिटेटिव स्टेट' में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए सख्त गाइडलाइन्स भी बनाई हैं ताकि इसका गलत इस्तेमाल न हो सके। अब जिला अदालतों और मेडिकल बोर्ड्स की निगरानी में ऐसे मामलों पर विचार किया जा सकेगा।
नैतिक और कानूनी बहस
क्या आप जानते हैं कि इच्छा मृत्यु हमेशा से एक विवादित विषय रहा है। कुछ लोग इसे धार्मिक आधार पर गलत मानते हैं, तो कुछ इसे मानवाधिकार का हिस्सा मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से यह स्पष्ट कर दिया है कि जब विज्ञान हार मान लेता है, तब कानून को मानवीय संवेदनाओं के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
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निष्कर्ष
हरीश राणा का मामला हमें सिखाता है कि जीवन केवल धड़कनों का चलना नहीं है, बल्कि सम्मान के साथ जीना है। सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला भारत के कानूनी ढांचे में एक बड़ी मानवीय जीत है। यह स्वीकार करता है कि हर इंसान को यह हक है कि वह अपने अंतिम समय में मशीन का हिस्सा न बना रहे, बल्कि शांति और गरिमा के साथ विदा ले।
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