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Vande Mataram 150 Years Celebration: वंदे मातरम् के 150 साल पूरे, जानिए एक राष्ट्रगीत आखिर कैसे बना देश की धड़कन?

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Vande Mataram 150 Years Celebration: वंदे मातरम् के 150 साल पूरे, जानिए एक राष्ट्रगीत आखिर कैसे बना देश की धड़कन?

Vande Mataram 150th Anniversary: भारत की आज़ादी की लड़ाई में अगर किसी गीत ने सबसे ज्यादा ऊर्जा, एकता और देशभक्ति की भावना लोगों के दिलों में भरने का काम किया है, तो वह है “वंदे मातरम्”।

ये साल यानी कि 2025 इस अमर गीत की 150वीं वर्षगांठ का प्रतीक है। सन् 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत न केवल साहित्यिक कृति है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा है।

वंदे मातरम् के इस ऐतिहासिक अवसर पर इसके जन्म, विकास और महत्त्व को नई पीढ़ी के लोगों को समझना सबसे ज्यादा आवश्यक है।

वंदे मातरम् कब और कैसे लिखा गया?

सन् 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने उपन्यास ‘आनंदमठ’ की रचना के दौरान वंदे मातरम् लिखा। यह गीत उस समय लिखा गया जब अंग्रेजी शासन के अत्याचार बढ़ रहे थे और भारत के लोगों में स्वतंत्रता की अलख जगने लगी थी। तब वंदे मातरम् एक नारा नहीं बल्कि एक राष्ट्रवादी स्वर बनकर उभरा।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिका

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत एक शक्तिशाली आंदोलन का प्रतीक बनकर सामने आया, जो हर गली, हर सभा, हर प्रदर्शन में गूंज उठता था। छात्रों ने इसकी धुन पर मार्च निकाले, नेताओं ने इसे संघर्ष का मंत्र बनाया और आम जनता के लिए यह जन-भावनाओं का स्वर बन गया।

लोकमान्य तिलक, अरविंदो घोष, बिपिनचंद्र पाल, लाला लाजपत राय जैसे कई स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रमुख साधन बताया। यह गीत ब्रिटिश सरकार को इतना असहज कर देता था कि उन्होंने कई जगह इसे गाने पर रोक तक लगा दी थी।

वंदे मातरम् को कैसे मिला राष्ट्रगीत का दर्जा?

सन् 1947 में देश की आज़ादी से पहले संविधान सभा ने इस गीत की लोकप्रियता और इसके महत्त्व को स्वीकार करते हुए वंदे मातरम् को भारत का राष्ट्रगीत घोषित किया। जबकि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान बना, वंदे मातरम् को समान सम्मान और वैचारिक महत्त्व प्रदान किया गया।

इस गीत की पहली दो पंक्तियाँ— “वंदे मातरम्, सुजलां सुफलाम् मलयजशीतलाम्…” संस्कृत भाषा में रची गई हैं, जो भारतीय प्रकृति, भूमि और संस्कृति का अद्भुत चित्र प्रस्तुत करती हैं। जबकि इस पूरे गीत की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने दो भाषाओं संस्कृत और बांग्ला में की थी।   

राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ का महत्त्व

2025 में इसके 150 साल पूरे होने पर यह अवसर केवल एक गीत की वर्षगांठ नहीं है, बल्कि भारतीय पहचान की पुनरावृत्ति का भी समय है। यह भारत के युवाओं को इस गीत से जुड़े स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों से जोड़ने का अवसर भी है।

इसके अलावा यह राष्ट्रभक्ति, एकता और सांस्कृतिक गर्व की भावना को फिर से जीवित करने का सही समय है। साहित्य और संगीत जगत के लोगों के लिए यह गीत ऐतिहासिक धरोहर को पुनः समझने और नए रूप में प्रस्तुत करने की प्रेरणा देता है।

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आज के समय में वंदे मातरम्

देश के प्रति यह गीत आज भी उतनी ही ऊर्जा जगाता है जितनी स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में। स्कूलों, राष्ट्रीय कार्यक्रमों, सेना के समारोहों और सांस्कृतिक आयोजनों में इसकी धुन आज भी रोमांच व जोश भर देती है। यह गीत भारत की आत्मा, संस्कृति, प्रकृति और देशभक्ति का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है।

समापन

वंदे मातरम् केवल शब्द नहीं भारत की धड़कन है। 150वीं वर्षगांठ पर हमें इस गीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके द्वारा दिए गए राष्ट्रभक्ति के संदेश को समझते हुए इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना चाहिए।

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FAQs

1. वंदे मातरम् किसने लिखा है?

उत्तर- वंदे मातरम् के लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय हैं।   

2. वंदे मातरम् कब लिखा गया?

उत्तर- वंदे मातरम् 7 नवंबर, सन् 1875 को लिखा गया था।

3. वंदे मातरम् गीत को किसका दर्जा मिला हुआ है?

उत्तर- वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला हुआ है।

4. राष्ट्रगीत वंदे मातरम् किस भाषा में लिखा गया है?

उत्तर- यह गीत संस्कृत और बांग्ला दो भाषाओं को मिलाकर लिखा गया है।  

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